नई दिल्ली/महासमुंद: ATM से ₹2000 निकालने पर केवल ₹1000 ही मिलने और खाते से पूरी राशि कट जाने की शिकायत को समय पर न सुलझाना बैंक को महंगा पड़ गया। 12 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उपभोक्ता अदालतों ने ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बैंक को कुल ₹4.36 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। यह मामला बैंकिंग सेवाओं में जवाबदेही और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर एक अहम मिसाल बन गया है।
मामला तब शुरू हुआ जब ग्राहक ने ATM से नकदी निकाली, लेकिन मशीन से निर्धारित राशि से ₹1000 कम निकले। ट्रांजैक्शन स्लिप और बैंक स्टेटमेंट में पूरी राशि कटने की पुष्टि होने के बावजूद शिकायत का तत्काल समाधान नहीं किया गया। ग्राहक ने बैंक शाखा में कई बार संपर्क किया, लेकिन तय समयसीमा के भीतर रकम वापस नहीं की गई।
बैंक की ओर से देरी और कथित उदासीनता के बाद ग्राहक ने जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान तकनीकी रिकॉर्ड और ट्रांजैक्शन डेटा के आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि ATM ट्रांजैक्शन में गड़बड़ी हुई थी और बैंक समय पर रिफंड देने में विफल रहा। उपभोक्ता फोरम ने इसे सेवा में कमी मानते हुए बैंक को राशि लौटाने और मुआवजा देने का आदेश दिया।
बैंक ने इस फैसले को चुनौती देते हुए मामला राज्य उपभोक्ता आयोग में दायर किया, जहां भी उसे राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा, लेकिन लंबी सुनवाई के बाद अंतिम निर्णय ग्राहक के पक्ष में ही आया। अदालतों ने माना कि बैंक निर्धारित समयसीमा के भीतर शिकायत का समाधान करने में असफल रहा और इससे ग्राहक को मानसिक उत्पीड़न तथा अनावश्यक आर्थिक बोझ झेलना पड़ा।
₹4.36 लाख की कुल राशि में मूल ₹1000 के अलावा मानसिक क्षति का मुआवजा, कानूनी खर्च और देरी से भुगतान पर लगाया गया दैनिक जुर्माना शामिल है। विशेषज्ञों का कहना है कि बैंकिंग मामलों में देरी पर लगाए जाने वाले दैनिक दंड का प्रावधान ही अंतिम मुआवजे को बड़ा बना देता है।
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भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, यदि ATM से नकदी कम निकलती है या ट्रांजैक्शन फेल होने के बावजूद खाते से पैसा कट जाता है, तो बैंक को निर्धारित समयसीमा—आमतौर पर सात कार्यदिवस—के भीतर राशि वापस करनी होती है। तय अवधि में रिफंड न करने पर बैंक पर प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लागू होता है, जो सीधे ग्राहक को भुगतान किया जाता है।
वित्तीय और उपभोक्ता अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उन लाखों ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है जो छोटी रकम के विवाद को नजरअंदाज कर देते हैं। दस्तावेजी साक्ष्य, समय पर शिकायत और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने पर उपभोक्ता अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।
बैंकिंग क्षेत्र में डिजिटल लेनदेन और ATM उपयोग बढ़ने के साथ ऐसे विवाद भी सामने आते रहते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी ATM गड़बड़ी की स्थिति में ग्राहक तुरंत बैंक को लिखित शिकायत दें, ट्रांजैक्शन स्लिप, SMS और बैंक स्टेटमेंट सुरक्षित रखें और शिकायत संख्या अवश्य लें।
यदि सात कार्यदिवस के भीतर समस्या का समाधान नहीं होता, तो ग्राहक बैंकिंग लोकपाल या उपभोक्ता फोरम का रुख कर सकते हैं। समय पर कार्रवाई करने से न केवल राशि वापस मिलने की संभावना बढ़ती है, बल्कि मुआवजा भी मिल सकता है।
यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि बैंकिंग सेवाओं में हुई छोटी गलती भी बड़ा कानूनी परिणाम ला सकती है। जागरूकता, धैर्य और कानूनी प्रक्रिया के जरिए एक सामान्य ग्राहक ने न केवल अपनी राशि वापस पाई, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था में जवाबदेही का मजबूत संदेश भी दिया।
