जयपुर: राजस्थान के बहुचर्चित ₹900 करोड़ जल जीवन मिशन घोटाले में नया मोड़ आ गया है। सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग में तैनात रहे पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कराने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। अदालत में इस मामले की सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है।
याचिका में कहा गया है कि जिन फर्मों को अधिकतर वर्क ऑर्डर दिए गए, उनमें से करीब 95 प्रतिशत को वित्त समिति की मंजूरी मिली थी, जिसकी अध्यक्षता उस समय के वरिष्ठ अधिकारी कर रहे थे। दावा किया गया है कि संबंधित अधिकारी के कार्यकाल में दस प्रतिशत से भी कम टेंडर स्वीकृत हुए और उस अवधि में किसी भी फर्म को भुगतान जारी नहीं किया गया, जिससे सरकारी खजाने को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ।
याचिका में यह भी कहा गया है कि अनियमितताओं की जानकारी मिलने पर उच्च स्तरीय समिति गठित की गई थी। समिति की रिपोर्ट के आधार पर संबंधित टेंडर रद्द किए गए, दोनों फर्मों को ब्लैकलिस्ट किया गया और विभागीय अधिकारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई। यह भी आरोप लगाया गया कि जांच एजेंसी ने उसी अधिकारी के बयान पर भरोसा करते हुए कार्रवाई की, जिसके खिलाफ पहले से FIR दर्ज कराई जा चुकी थी।
यह घटनाक्रम हाल ही में हुई भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की बड़ी कार्रवाई के बाद सामने आया है। एजेंसी ने देश के कई राज्यों में 15 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी कर नौ लोगों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार आरोपियों में विभाग के दो मुख्य अभियंता, ठेकेदार और उनसे जुड़े अन्य लोग शामिल हैं।
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जांच एजेंसी के अनुसार दो निजी कंपनियों ने एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के नाम पर फर्जी कम्प्लीशन सर्टिफिकेट तैयार कर करोड़ों रुपये के टेंडर हासिल किए। आरोप है कि इन दस्तावेजों के जरिए लगभग ₹960 करोड़ मूल्य के कार्यों के लिए पात्रता दिखाई गई और बाद में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुईं।
जांच में यह भी सामने आया कि ₹50 करोड़ से अधिक के प्रोजेक्ट के लिए ‘साइट विजिट सर्टिफिकेट’ की अनिवार्यता जोड़ी गई, जो स्थापित नियमों के खिलाफ बताई जा रही है। आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए बोली लगाने वाली कंपनियों की पहचान पहले से उजागर कर ‘टेंडर पूलिंग’ कराई गई, जिससे टेंडर प्रीमियम असामान्य रूप से बढ़े और उन्हें मंजूरी दी गई।
छापेमारी के दौरान जयपुर, बाड़मेर, सीकर, जालौर, उदयपुर, करौली और दिल्ली समेत कई स्थानों पर तलाशी ली गई थी। जांच एजेंसी ने संबंधित अधिकारी के आवास की भी तलाशी लेकर टेंडर स्वीकृति से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल की।
मामले ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। जहां एक ओर जांच एजेंसी बड़े वित्तीय घोटाले का दावा कर रही है, वहीं याचिकाकर्ता का कहना है कि उनके कार्यकाल में न तो भुगतान हुआ और न ही किसी प्रकार की वित्तीय हानि हुई। हाईकोर्ट के फैसले से यह तय होगा कि FIR पर आगे कार्रवाई जारी रहेगी या नहीं।
फिलहाल एजेंसी फर्जी दस्तावेजों, टेंडर प्रक्रिया और वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच कर रही है। मामले को राज्य के सबसे बड़े कथित घोटालों में से एक माना जा रहा है, जिसके कानूनी और प्रशासनिक प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं।
