नई दिल्ली: द्वारका इलाके में साइबर ठगों ने आर्मी से रिटायर्ड 75 वर्षीय कैप्टन को 38 दिनों तक झांसे में रखकर करीब ₹65 लाख ठग लिए। पुराने किरायेदार के नाम से किए गए फोन ने भरोसा दिलाया, जिसके बाद फर्जी बैंक स्लिप, वीजा फीस, एयरपोर्ट जुर्माना और टैक्स के नाम पर अलग-अलग खातों में रकम ट्रांसफर करवाई गई। अंत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाकर और पैसे मांगने की कोशिश की गई। मामला सामने आने के बाद जांच स्पेशल सेल की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (IFSO) यूनिट को सौंप दी गई है।
पीड़ित नंदन सिंह अपनी पत्नी के साथ द्वारका में रहते हैं। उन्होंने पुलिस को बताया कि कुछ समय पहले उनके पास एक इंटरनेशनल नंबर से कॉल आई। कॉल करने वाले ने खुद को ‘कुलदीप’ बताया, जो करीब एक साल पहले उनके घर में किराएदार रह चुका था। पहचान का फायदा उठाते हुए उसने कहा कि वह विदेश से भारत लौट रहा है और पैसे भेजना चाहता है। भरोसा होने पर पीड़ित ने अपनी पत्नी का बैंक अकाउंट नंबर दे दिया।
इसके कुछ समय बाद कॉलर ने दावा किया कि उसने रकम ट्रांसफर कर दी है और वीजा एजेंट को ₹4 लाख देने होंगे। पीड़ित ऑनलाइन ट्रांजैक्शन नहीं करते थे, इसलिए उन्हें पास की एक दुकान के जरिए पैसे ट्रांसफर करने को कहा गया। अगले दिन नई कहानी सुनाई गई कि एयरपोर्ट पर झगड़े के कारण भारी जुर्माना लग गया है। इसी तरह अलग-अलग बहाने बनाकर पैसे मंगवाए जाते रहे।
ठगों ने व्हाट्सऐप पर फर्जी एचएसबीसी बैंक स्लिप भेजी, जिसमें ₹14.25 लाख और ₹18.45 लाख ट्रांसफर दिखाया गया था। इसके बाद खुद को बैंक मैनेजर बताने वाले व्यक्ति ने इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन पर टैक्स और क्लियरेंस फीस के नाम पर रकम मांगी। भरोसा कायम रखने के लिए लगातार कॉल किए जाते रहे। पीड़ित ने अपनी एफडी तुड़वाकर पैसे ट्रांसफर कर दिए और जब रकम कम पड़ गई तो पड़ोसियों से उधार लेकर भुगतान किया।
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पुलिस के अनुसार, यह सिलसिला करीब 38 दिनों तक चला। जब बुजुर्ग ने आगे पैसे देने से इनकार किया तो एक नए नंबर से कॉल आया। कॉलर ने खुद को मुंबई साइबर क्राइम का अधिकारी बताते हुए ‘डिजिटल अरेस्ट’ का डर दिखाया और केस बंद कराने के लिए ₹4.70 लाख मांगे। घबराए पीड़ित ने अपनी बेटी को फोन किया। बेटी ने तुरंत उन्हें कोई भुगतान न करने को कहा और साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद द्वारका साइबर थाने में मामला दर्ज किया गया।
जांच में सामने आया है कि पूरी रकम एक स्थानीय दुकानदार के जरिए अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई गई। कई खातों के इस्तेमाल और विदेशी नंबर से कॉल होने के कारण अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह की आशंका जताई जा रही है। पुलिस बैंक खातों की केवाईसी, ट्रांजैक्शन ट्रेल, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और दुकानदार की भूमिका की जांच कर रही है। जिन खातों में पैसे गए हैं, उन्हें फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक यह ‘हाइब्रिड सोशल इंजीनियरिंग’ मॉडल है, जिसमें परिचित की पहचान, फर्जी बैंक क्रेडिट, टैक्स और पुलिस कार्रवाई के डर का इस्तेमाल एक साथ किया जाता है। बुजुर्गों को निशाना बनाने के पीछे उनकी सीमित डिजिटल जानकारी और अथॉरिटी के प्रति डर को बड़ा कारण माना जा रहा है।
पुलिस ने लोगों को चेतावनी दी है कि विदेश से पैसे भेजने, कस्टम या टैक्स के नाम पर भुगतान, व्हाट्सऐप पर बैंक स्लिप और वीडियो कॉल पर पुलिस बनकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ की धमकी देने जैसे मामलों से सतर्क रहें। किसी भी संदिग्ध कॉल या ट्रांजैक्शन की स्थिति में तुरंत 1930 हेल्पलाइन या नजदीकी साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी गई है।
जांच एजेंसियों का कहना है कि रकम कई परतों में ट्रांसफर की गई है, जिससे ट्रेल जटिल हो गया है। हालांकि बैंक खातों, कॉलिंग नेटवर्क और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर मनी म्यूल चेन और गिरोह तक पहुंचने की कोशिश जारी है।
