संगम साड़ी सेंटर की गोलघर और गोरखनाथ शाखाओं में फर्जी बिल बनाकर करीब ₹2 करोड़ की रकम गबन करने के मामले में पुलिस ने कैशियर-कम-सेल्समैन लक्की शर्मा को गिरफ्तार कर लिया है। यह इस प्रकरण में दूसरी गिरफ्तारी है, जबकि अन्य नामजद कर्मचारी अभी फरार हैं। पुलिस ने पूरे वित्तीय लेनदेन की फॉरेंसिक जांच शुरू कर दी है, जिससे घोटाले की वास्तविक अवधि और राशि का पता लगाया जा सके।
शाहपुर क्षेत्र की एक निजी कॉलोनी से शुक्रवार सुबह पकड़े गए लक्की शर्मा दुकान में कैश और बिलिंग दोनों का काम देखते थे। जांचकर्ताओं का कहना है कि इसी वजह से उन्हें बिक्री रिकॉर्ड, नकदी प्रवाह और बिलिंग सिस्टम तक सीधी पहुंच थी। इससे पहले 3 फरवरी को एक अन्य आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।
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मामला 3 जनवरी को दुकान की मालकिन की तहरीर पर दर्ज हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कैशियर रवि प्रताप सिंह, लक्की शर्मा, सूरज जायसवाल, प्रियेश सिंह और सेल्समैन प्रशांत नायक ने मिलकर कूटरचित बिल तैयार किए और वास्तविक बिक्री से अधिक रकम दिखाकर नकदी निकाल ली। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे लंबे समय तक चलती रही, जिससे लगभग ₹2 करोड़ का गबन हुआ।
पुलिस जांच में बिल, कैश बुक, स्टॉक रजिस्टर और बैंक प्रविष्टियों के मिलान में भारी अंतर मिला। रिकॉर्ड में दर्शाई गई बिक्री और वास्तविक स्टॉक मूवमेंट मेल नहीं खा रहे थे। फर्जी बिलों के जरिए नकदी निकासी को वैध दिखाने के लिए कागजी लेनदेन तैयार किया गया, जिससे लंबे समय तक धोखाधड़ी छिपी रही।
जांच अधिकारियों के अनुसार दुकान में आंतरिक नियंत्रण की कमी, रियल-टाइम स्टॉक मिलान का अभाव और कैश व बिलिंग की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति के पास होना घोटाले का मुख्य कारण बना। अब यह भी जांच की जा रही है कि क्या प्रबंधन स्तर पर निगरानी की कमी से नुकसान बढ़ा।
पुलिस मनी ट्रेल का विश्लेषण कर रही है। बैंक खातों, डिजिटल पेमेंट लॉग और आरोपियों के व्यक्तिगत खर्चों की जांच से यह पता लगाया जा रहा है कि गबन की रकम कहां खर्च हुई और क्या इसे आपस में बांटा गया। बाहरी व्यक्तियों की भूमिका से भी इनकार नहीं किया गया है।
अधिकारियों ने इसे संगठित वित्तीय अनियमितता बताया है, जिसमें कई कर्मचारियों की मिलीभगत थी। आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं में कार्रवाई की जा रही है। फरार आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।
लेखा-जोखा का फॉरेंसिक परीक्षण शुरू किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होगा कि फर्जी बिलिंग कब से चल रही थी और कुल नुकसान कितना हुआ। पुलिस का मानना है कि विस्तृत ऑडिट के बाद ₹2 करोड़ से अधिक गबन का खुलासा भी हो सकता है।
इस घटना के बाद उच्च नकदी लेनदेन वाले खुदरा प्रतिष्ठानों में वित्तीय नियंत्रण की समीक्षा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कार्यों का पृथक्करण, स्वचालित इन्वेंट्री ट्रैकिंग और नियमित थर्ड-पार्टी ऑडिट इस तरह की कर्मचारी-स्तरीय धोखाधड़ी रोकने के लिए आवश्यक हैं।
पुलिस ने संकेत दिया है कि मनी ट्रेल स्पष्ट होने के बाद रिकवरी की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। मामले की जांच जारी है और जल्द ही अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी की संभावना जताई गई है।
