34 वीडियो, 679 तस्वीरें और 74 गवाह: बांदा कांड में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, दंपती को फांसी

Team The420
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बच्चों के यौन शोषण, उनकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाकर इंटरनेट व डार्कवेब पर प्रसारित करने के सनसनीखेज मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने सिंचाई विभाग के निलंबित जेई रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है। 163 पन्नों के विस्तृत फैसले में अदालत ने इस अपराध को “दुर्लभतम श्रेणी” का बताते हुए कहा कि यह समाज की नैतिक संरचना और बच्चों की गरिमा पर गंभीर हमला है, इसलिए कठोरतम दंड आवश्यक है।

मामला नवंबर 2020 में सामने आया था, जब केंद्रीय जांच एजेंसी ने विश्वसनीय सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया था। जांच में खुलासा हुआ कि आरोपी बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर और आसपास के जिलों के बच्चों का यौन शोषण करते थे और उसके वीडियो बनाकर बेचते थे।

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सबसे अहम साक्ष्य एक पेन ड्राइव रही, जिसमें 34 अश्लील वीडियो और 679 तस्वीरें मिलीं। इन डिजिटल साक्ष्यों में कई पीड़ित बच्चों की पहचान हुई। जांच के दौरान इंटरनेट और सोशल प्लेटफॉर्म पर भी इसी तरह की सामग्री बरामद हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह कोई एकल अपराध नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क के रूप में संचालित हो रहा था।

जांच एजेंसियों ने पाया कि आरोपी डार्कवेब, सोशल मीडिया और विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए सामग्री साझा करते और बेचते थे। इसके लिए कई मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया गया। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की फॉरेंसिक जांच ने अभियोजन के मामले को मजबूत किया और अदालत में डिजिटल ट्रेल निर्णायक साबित हुई।

मुकदमे की सुनवाई 5 जून 2023 से शुरू हुई और कुल 74 गवाहों को अदालत में पेश किया गया, जिनमें 25 पीड़ित बच्चे भी शामिल थे। पीड़ितों की गवाही, चिकित्सकीय रिपोर्ट, डिजिटल साक्ष्य और जब्त सामग्री के आधार पर अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी करार दिया।

अदालत ने रामभवन पर ₹6.45 लाख और दुर्गावती पर ₹5.40 लाख का अर्थदंड भी लगाया। आदेश में कहा गया कि जुर्माने की राशि से अदालत में गवाही देने वाले प्रत्येक पीड़ित बच्चे को ₹10-10 लाख की क्षतिपूर्ति दी जाएगी। इसके अतिरिक्त आरोपी के पास से बरामद ₹8 लाख और उस पर अर्जित ब्याज भी पीड़ितों में समान रूप से वितरित किया जाएगा।

दुर्गावती को पहले उच्च न्यायालय से जमानत मिली थी, लेकिन दोषसिद्धि के बाद 18 फरवरी 2026 को उसे पुनः जेल भेज दिया गया। फैसला सुनाए जाने के बाद दोनों आरोपियों को कड़ी सुरक्षा में जेल ले जाया गया।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि इस प्रकार के अपराध केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक अपराध हैं, जो बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर स्थायी प्रभाव डालते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में दया की कोई गुंजाइश नहीं है।

जांच के दौरान कई देशों से जुड़े डिजिटल लिंक सामने आए थे और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ था, जिससे मामले का दायरा वैश्विक स्तर तक पहुंच गया। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस मामले की जांच में महत्वपूर्ण रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बाल यौन अपराधों के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहां डिजिटल साक्ष्य, वैज्ञानिक जांच और पीड़ितों की गवाही के आधार पर दोष सिद्ध किया गया।

प्रशासन ने कहा कि पीड़ित बच्चों के पुनर्वास, काउंसलिंग और शिक्षा सहायता के लिए अलग योजना तैयार की जाएगी। साथ ही साइबर निगरानी, जागरूकता अभियान और स्कूल स्तर पर सुरक्षा कार्यक्रमों को मजबूत किया जाएगा, ताकि ऐसे अपराधों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

यह फैसला न केवल अपराधियों के लिए कड़ा संदेश है, बल्कि बाल सुरक्षा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी माना जा रहा है।

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