लखनऊ: उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीसीडा) की कार्यप्रणाली में गंभीर अनियमितताओं का खुलासा करते हुए भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट ने करोड़ों रुपये के ठेकों के आवंटन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार जाली दस्तावेजों के आधार पर दो बिल्डर कंपनियों को ₹255.75 करोड़ के औद्योगिक विकास कार्यों के अनुबंध दे दिए गए, जबकि पात्रता और अनुभव प्रमाणपत्रों का समुचित सत्यापन नहीं किया गया।
विधानमंडल में पेश यह रिपोर्ट वर्ष 2017-18 से 2021-22 की अवधि को कवर करती है और इसमें टेंडर प्रक्रिया, औद्योगिक भूखंड आवंटन, भूमि अधिग्रहण, विकास कार्यों की गुणवत्ता, वित्तीय नियंत्रण और वसूली तंत्र में व्यापक खामियों की ओर संकेत किया गया है। रिपोर्ट ने यूपीसीडा की आंतरिक निगरानी प्रणाली और जवाबदेही ढांचे को भी कठघरे में खड़ा किया है।
सीएजी के मुताबिक वर्ष 2015-16 में मेसर्स बालाजी बिल्डर को औद्योगिक क्षेत्रों के दो निर्माण खंडों के विकास के लिए ₹143.22 करोड़ के 13 अनुबंध दे दिए गए। बाद में जांच में पाया गया कि कंपनी के अनुभव प्रमाणपत्र जाली थे, जिसके चलते 2017 में अनुबंध निरस्त करने पड़े। इसी प्रकार मेसर्स आकाश इंजीनियरिंग एंड बिल्डर्स को अनुभव और एफडी का सत्यापन किए बिना ₹112.53 करोड़ के दो अनुबंध दिए गए, जिन्हें 2018 में फर्जी दस्तावेज मिलने पर रद्द किया गया।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि बोली प्रक्रिया से पहले ठेकेदारों की तकनीकी और वित्तीय क्षमता का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया। ₹1.01 करोड़ से ₹63.41 करोड़ तक की 27 निविदाएं ऐसे ठेकेदारों को दी गईं जो पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरते थे। इसके परिणामस्वरूप 11 परियोजनाएं 61 से 2612 दिन की देरी से पूरी हुईं, जबकि 14 परियोजनाएं 2678 दिन बाद भी अधूरी रहीं। इससे परियोजना लागत बढ़ी और सार्वजनिक संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।
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वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सीएजी ने 16 प्रकरणों में ₹13.71 करोड़ की क्षतिपूर्ति और 34 कार्यों में ₹1.63 करोड़ के गुणवत्ता परीक्षण शुल्क की वसूली न किए जाने को गंभीर माना है। कम क्षमता वाले ठेकेदारों को उच्च मूल्य के कार्य सौंपे जाने के उदाहरण भी रिपोर्ट में दर्ज हैं, जिससे परियोजनाओं की गुणवत्ता और समयबद्धता प्रभावित हुई।
भूमि आवंटन प्रक्रिया में भी नियमों की अनदेखी सामने आई। मथुरा औद्योगिक क्षेत्र-बी में 3929 वर्गमीटर का भूखंड ₹93.08 लाख में बिना निर्धारित आवेदन और साक्षात्कार प्रक्रिया पूरी किए आवंटित कर दिया गया। वहीं कानपुर देहात के जैनपुर औद्योगिक क्षेत्र में 5018.65 वर्गमीटर का भूखंड अपात्र आवेदक को ₹1.10 करोड़ में दे दिया गया, जबकि मूल्यांकन के आधार पर यह भूखंड एक अन्य पात्र इकाई को मिलना चाहिए था।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि प्रकरणों में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद दोषी अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है। ₹12.65 करोड़ की देय राशि में से केवल ₹1.39 करोड़ की वसूली हो सकी। सीएजी ने जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उनके विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने की सिफारिश की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि औद्योगिक विकास परियोजनाओं में इस प्रकार की प्रक्रियागत चूक न केवल वित्तीय नुकसान पहुंचाती है, बल्कि निवेशकों के विश्वास और परियोजनाओं की समयबद्धता को भी प्रभावित करती है। टेंडर सत्यापन, पात्रता जांच और निगरानी तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है ताकि सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके।
सरकारी स्तर पर रिपोर्ट के निष्कर्षों की समीक्षा की जा रही है और सुधारात्मक कदमों की संभावना जताई गई है। पारदर्शिता बढ़ाने, डिजिटल सत्यापन प्रणाली लागू करने और जवाबदेही तय करने के लिए प्रक्रियागत सुधारों पर जोर दिया जा सकता है।
