वाराणसी से पकड़ा गया गोलघर शाखा का तत्कालीन प्रबंधक; फर्जी ट्रांसफर और अंदरूनी मिलीभगत से हुआ था गबन

रिश्तेदारों के नाम पर खोले खाते, बैंक से उड़ाए ₹34.78 लाख — 27 साल बाद गिरफ्तारी

Roopa
By Roopa
5 Min Read

गोरखपुर: आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने 27 वर्ष पुराने बैंक गबन प्रकरण में बड़ी कार्रवाई करते हुए पंजाब एंड सिंध बैंक की गोलघर शाखा के तत्कालीन शाखा प्रबंधक जयदीप मित्रा को वाराणसी से गिरफ्तार कर लिया। आरोपी लंबे समय से फरार चल रहा था और उस पर फर्जी बैंक खातों के जरिए ₹34.78 लाख की राशि गबन करने का आरोप है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को न्यायालय में पेश करने की तैयारी की जा रही है, जहां से आगे की रिमांड लेकर पूछताछ की जाएगी।

1999 में हुआ था संगठित गबन

जांच के अनुसार वर्ष 1999 में गोलघर शाखा में तैनात शाखा प्रबंधक, कैशियर, क्लर्क और अन्य कर्मचारियों ने कथित रूप से अपने सगे-संबंधियों के नाम पर फर्जी बैंक खाते खुलवाए थे। इन खातों में बैंक की राशि को अवैध तरीके से ट्रांसफर किया गया और बाद में निकासी कर ली गई। इस सुनियोजित हेरफेर के जरिए कुल ₹34,78,420 का गबन किया गया था।

मामले के उजागर होते ही बैंकिंग महकमे में हड़कंप मच गया था और कैंट थाने में विश्वासघात, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और आपराधिक साजिश की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था।

2000 में EOW को सौंपी गई जांच

प्रारंभिक जांच स्थानीय पुलिस ने की, लेकिन प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए 10 जुलाई 2000 को मामला आर्थिक अपराध शाखा को सौंप दिया गया। विस्तृत जांच में कुल नौ आरोपियों की संलिप्तता सामने आई। इनमें से अधिकांश को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था, जबकि दो आरोपी लंबे समय से फरार थे।

जयदीप मित्रा की गिरफ्तारी के साथ इस मामले में एक प्रमुख फरार आरोपी कानून के शिकंजे में आ गया है। दूसरे फरार आरोपी की तलाश अभी भी जारी है।

Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology

मुखबिर की सूचना पर वाराणसी में दबिश

EOW को गुप्त सूचना मिली थी कि मुख्य आरोपी वाराणसी में छिपकर रह रहा है। इसके बाद टीम ने निगरानी कर दबिश दी और उसे गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के दौरान आरोपी की पहचान और पुराने रिकॉर्ड का मिलान किया गया, जिससे उसकी पुष्टि हुई।

अधिकारियों के अनुसार आरोपी लंबे समय से अपनी पहचान छिपाकर अलग-अलग स्थानों पर रह रहा था, जिससे गिरफ्तारी में देरी हुई।

अंदरूनी मिलीभगत के स्पष्ट संकेत

जांच एजेंसियों का कहना है कि यह मामला बैंक के भीतर मिलीभगत से किए गए वित्तीय अपराध का उदाहरण है। फर्जी खातों का खुलवाना, उनमें रकम ट्रांसफर करना और बाद में निकासी करना एक संगठित प्रक्रिया का हिस्सा था। अलग-अलग कर्मचारियों की भूमिकाएं तय थीं, जिससे गबन लंबे समय तक पकड़ में नहीं आया।

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में मजबूत आंतरिक ऑडिट, डुअल ऑथराइजेशन और रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग जरूरी होती है, ताकि अंदरूनी गड़बड़ियों को समय रहते रोका जा सके।

दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई

EOW अधिकारियों ने बताया कि मामले में उपलब्ध बैंकिंग रिकॉर्ड, खाता विवरण, ट्रांसफर एंट्री और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। आरोपी से पूछताछ के दौरान गबन की राशि के उपयोग, अन्य लाभार्थियों और फरार सहयोगियों के बारे में जानकारी जुटाई जाएगी।

जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि शेष आरोपियों की तलाश जारी है और सभी के खिलाफ साक्ष्यों के आधार पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

भरोसे पर असर, जवाबदेही जरूरी

लंबे समय बाद हुई इस गिरफ्तारी ने एक बार फिर बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित किया है। अंदरूनी गबन के मामलों का सीधा असर ग्राहकों के भरोसे और संस्थागत साख पर पड़ता है।

आर्थिक अपराध शाखा ने कहा है कि मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए जांच जारी रहेगी और सभी दोषियों की भूमिका तय कर कानून के तहत कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

हमसे जुड़ें

Share This Article