नई दिल्ली: रिजर्व बैंक ने ओवर-द-काउंटर (OTC) डेरिवेटिव बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए यूनिक ट्रांजैक्शन आइडेंटिफायर (UTI) अनिवार्य कर दिया है। नए सर्कुलर के तहत अब हर OTC डेरिवेटिव सौदे को एक अलग और विशिष्ट कोड दिया जाएगा, जिससे वित्तीय लेनदेन की पहचान, ट्रैकिंग और निगरानी अधिक प्रभावी हो सकेगी।
यह कदम ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक स्तर पर डेरिवेटिव बाजार के डेटा को समेकित करने और सिस्टमेटिक जोखिम पर नजर रखने की आवश्यकता बढ़ी है। RBI ने पहले इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट जारी कर बैंकों और बाजार प्रतिभागियों से सुझाव मांगे थे। प्राप्त फीडबैक को शामिल करते हुए अब अंतिम दिशा-निर्देश लागू कर दिए गए हैं।
क्या बदलेगा अब
नए नियम के तहत ब्याज दर, करेंसी, कमोडिटी और अन्य OTC डेरिवेटिव से जुड़े हर सौदे को यूनिक रेफरेंस नंबर दिया जाएगा। यह कोड उस ट्रांजैक्शन की पहचान के साथ-साथ उसकी रिपोर्टिंग और ऑडिट ट्रेल के लिए भी इस्तेमाल होगा। अभी तक ऐसे सौदों का डेटा अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बिखरा रहता था, जिससे पूरी तस्वीर एक साथ देखना कठिन होता था।
UTI व्यवस्था लागू होने के बाद हर डील को ट्रैक करना आसान होगा, डुप्लीकेट डेटा की समस्या कम होगी और रेगुलेटर को बाजार की समग्र स्थिति का स्पष्ट आकलन मिल सकेगा। इससे संभावित जोखिमों की पहचान समय रहते की जा सकेगी।
OTC डील क्या होती है
OTC यानी ओवर-द-काउंटर सौदे वे होते हैं जो NSE या BSE जैसे एक्सचेंज पर नहीं, बल्कि दो पक्षों के बीच सीधे तय होते हैं। इन सौदों की शर्तें कस्टमाइज्ड होती हैं और आमतौर पर बड़े बैंक, वित्तीय संस्थान और कॉरपोरेट इन्हें करते हैं।
इसके विपरीत एक्सचेंज ट्रेड में कीमतें पारदर्शी होती हैं, नियम अधिक सख्त होते हैं और आम निवेशक भी भाग ले सकते हैं। OTC बाजार में लचीलापन ज्यादा होता है, लेकिन डेटा बिखराव और निगरानी की सीमाओं के कारण जोखिम भी अधिक रहता है।
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आम निवेशकों के लिए क्या मायने
यह नियम सीधे आम लोगों के बैंक खाते, एफडी या शेयर ट्रेडिंग पर लागू नहीं होगा, लेकिन इसका असर पूरे वित्तीय तंत्र की स्थिरता पर पड़ेगा। बड़े डेरिवेटिव सौदों की बेहतर निगरानी से बैंकिंग प्रणाली में जोखिम कम होगा, जिसका सकारात्मक प्रभाव अंततः आम ग्राहकों और निवेशकों पर पड़ेगा।
बैंकों के लिए तकनीकी बदलाव
RBI के निर्देश के बाद बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपने आईटी सिस्टम अपडेट करने होंगे ताकि हर OTC डील के साथ UTI टैग किया जा सके। इससे रिपोर्टिंग, डेटा एग्रीगेशन और रेगुलेटरी मॉनिटरिंग अधिक सटीक होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती चरण में सिस्टम अपग्रेड की लागत आएगी, लेकिन लंबे समय में इससे जोखिम प्रबंधन मजबूत होगा।
क्यों जरूरी था यह कदम
वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से डेरिवेटिव बाजार की पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। बिना यूनिक पहचान के बड़े वित्तीय सौदों की सही निगरानी करना मुश्किल होता है, जिससे संकट के समय जोखिम का आकलन प्रभावित हो सकता है। UTI व्यवस्था से रेगुलेटर को रियल-टाइम या नजदीकी समय में डेटा उपलब्ध होगा और बाजार की गतिविधियों पर बेहतर नियंत्रण संभव होगा।
वित्तीय क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यह कदम तकनीकी जरूर है, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक होगा। इससे बाजार में अनुशासन बढ़ेगा, निगरानी मजबूत होगी और वित्तीय प्रणाली को दीर्घकालिक स्थिरता मिलेगी।
संक्षेप में, UTI लागू होने से OTC डेरिवेटिव बाजार अधिक पारदर्शी, ट्रैसेबल और सुरक्षित बनेगा, जो भारतीय वित्तीय तंत्र को वैश्विक मानकों के करीब ले जाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
