हाई-प्रोफाइल ‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगी मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत ₹1.76 करोड़ की बैंक राशि अस्थायी रूप से अटैच की है। एजेंसी के अनुसार यह रकम उन खातों से जुड़ी है, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराध से प्राप्त धन को घुमाने के लिए किया गया था।
ईडी की जालंधर इकाई ने 14 फरवरी 2026 को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कार्रवाई करते हुए एक म्यूल एंटिटी से जुड़े बैंक खाते में पड़ी राशि को अटैच किया। मामला लुधियाना साइबर क्राइम थाने में दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी के अधिकारी बताने वाले ठगों ने एक उद्योगपति से ₹7 करोड़ की वसूली की।
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जांच के मुताबिक आरोपियों ने वीडियो कॉल के जरिए कथित “डिजिटल अरेस्ट” का माहौल बनाया। फर्जी गिरफ्तारी वारंट, नकली अदालती कार्यवाही और मनी लॉन्ड्रिंग जांच का डर दिखाकर पीड़ित को दो दिनों तक लगातार निगरानी में रखा गया। उसे यह विश्वास दिलाया गया कि धन को एक तथाकथित “सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट” में ट्रांसफर करना जांच प्रक्रिया का हिस्सा है।
एजेंसी का कहना है कि ठगी की रकम को कई परतों में घुमाकर उसके स्रोत को छिपाने की कोशिश की गई। शुरुआती ट्रांजैक्शन म्यूल खातों में भेजे गए, जिनका संचालन गिरोह से जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा था। इसके बाद धन को शेल कंपनियों और फर्जी व्यापारिक इकाइयों के माध्यम से आगे ट्रांसफर किया गया, ताकि ट्रेल पकड़ना कठिन हो सके।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ लेनदेन व्यापार-आधारित मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए विदेश भेजे गए, जबकि शेष राशि का इस्तेमाल वर्चुअल डिजिटल एसेट्स खरीदने में किया गया। ईडी के अनुसार अटैच की गई ₹1.76 करोड़ की रकम उसी नेटवर्क का हिस्सा है, जिसका उपयोग साइबर ठगी से प्राप्त धन को रिसीव और डायवर्ट करने के लिए किया गया था।
सूत्रों के मुताबिक आरोपियों ने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को नौकरी और लोन का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए। बाद में इन खातों का उपयोग म्यूल अकाउंट के रूप में किया गया। जांच में ऐसे खातों में कई अन्य साइबर अपराध मामलों से जुड़ी रकम जमा होने के प्रमाण भी मिले हैं।
इस मामले में पहले भी कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाए गए थे और दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था, जो फिलहाल न्यायिक हिरासत में हैं। उनके कब्जे से बैंक खातों में जमा करोड़ों रुपये, एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन बरामद किए गए थे। एजेंसियों का कहना है कि डिजिटल डिवाइस और बैंकिंग डेटा की फॉरेंसिक जांच के जरिए मनी ट्रेल को और विस्तार से खंगाला जा रहा है।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार “डिजिटल अरेस्ट” ठगी का नया तरीका है, जिसमें ठग फर्जी पहचान, नकली कानूनी दस्तावेज और लाइव वीडियो निगरानी का इस्तेमाल कर पीड़ित पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हैं। पीड़ित को वास्तविक जांच का भ्रम होता है और वह खुद ही रकम ट्रांसफर कर देता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मल्टी-लेयर ट्रांजैक्शन, शेल कंपनियां और क्रिप्टो एसेट्स के इस्तेमाल से जांच जटिल हो जाती है, लेकिन बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल फॉरेंसिक के जरिए धन के प्रवाह को ट्रैक करना संभव है।
जांच एजेंसियों का मानना है कि संगठित साइबर गिरोह अब उच्च-नेटवर्थ व्यक्तियों को निशाना बना रहे हैं और तकनीकी साधनों का उपयोग कर फर्जी कानूनी प्रक्रिया का आभास पैदा कर रहे हैं। ईडी की यह कार्रवाई साइबर अपराध से जुड़े वित्तीय नेटवर्क पर शिकंजा कसने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
एजेंसी के अनुसार मामले में धन के अंतिम लाभार्थियों की पहचान, विदेशी ट्रांजैक्शन की जांच और नेटवर्क से जुड़े अन्य खातों की पड़ताल जारी है।
