सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संसद द्वारा लागू किए गए कानून को बिना विस्तृत सुनवाई के अंतरिम आदेश से रोका नहीं जा सकता, इसलिए फिलहाल विवादित प्रावधान प्रभावी रहेंगे। मामले की अगली सुनवाई मार्च में तय की गई है।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने कहा कि यह मामला गोपनीयता के मौलिक अधिकार और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन से जुड़ा “जटिल और संवेदनशील” प्रश्न है। अदालत ने केंद्र से विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है ताकि कानून के प्रभाव और उद्देश्य का समग्र परीक्षण किया जा सके।
Certified Cyber Crime Investigator Course Launched by Centre for Police Technology
याचिकाओं में खास तौर पर DPDP एक्ट की धारा 44(3) को चुनौती दी गई है, जिसने RTI एक्ट की धारा 8(1)(j) में संशोधन कर व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण पर व्यापक छूट दे दी है। पहले सार्वजनिक हित अधिक होने पर व्यक्तिगत जानकारी भी साझा की जा सकती थी, लेकिन नए प्रावधान में इस सार्वजनिक हित परीक्षण को हटाने का आरोप है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे पारदर्शिता कमजोर होगी और भ्रष्टाचार, हितों के टकराव या सरकारी निर्णयों की जांच में बाधा आएगी।
पत्रकारों, पारदर्शिता कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों की ओर से दायर याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि संशोधित प्रावधानों के कारण सार्वजनिक अधिकारियों से संबंधित जानकारी तक पहुंच सीमित हो सकती है, जबकि ऐसी जानकारी अक्सर सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए जरूरी होती है। उनका तर्क है कि गोपनीयता की आड़ में प्रशासनिक निर्णयों की जांच मुश्किल हो सकती है।
एक अन्य प्रमुख आपत्ति तथाकथित “फिड्यूशियरी” प्रावधानों पर है, जिनके तहत केंद्र सरकार को किसी भी डेटा फिड्यूशियरी से अपनी आवश्यकता के अनुसार डेटा मांगने का अधिकार मिल जाता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे कार्यपालिका को अत्यधिक विवेकाधिकार मिल सकता है और इसके दुरुपयोग की आशंका है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन का सिद्धांत तय कर चुकी है। हालांकि पीठ ने माना कि नए विधायी ढांचे के कारण इन मुद्दों की ताजा और गहन जांच आवश्यक है।
अदालत ने तीन प्रमुख याचिकाओं—द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की ओर से वेंकटेश नायक, पत्रकार नितिन सेठी और नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन (NCPRI) द्वारा दायर—को बड़ी पीठ के पास भेज दिया है, जिससे संकेत मिलता है कि मामले का संवैधानिक महत्व व्यापक है।
यह मामला अब इस बहस का केंद्र बन गया है कि भारत का डेटा संरक्षण ढांचा नागरिकों की गोपनीयता की रक्षा करते हुए सूचना तक पहुंच और लोकतांत्रिक जवाबदेही को किस हद तक सुरक्षित रखता है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय RTI व्यवस्था, सरकारी पारदर्शिता और सार्वजनिक संस्थाओं के पास मौजूद व्यक्तिगत डेटा के उपयोग और प्रकटीकरण के नियमों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
