‘खामोश लेकिन ख़तरनाक’ अपराध: साइबर फ्रॉड पर राजस्थान HC सख़्त, दो आरोपियों की ज़मानत याचिका खारिज

Team The420
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जयपुर | राजस्थान High Court ने देश में तेज़ी से बढ़ते साइबर फ्रॉड और ऑनलाइन बैंकिंग ठगी पर गंभीर चिंता जताते हुए दो आरोपियों की ज़मानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने डिजिटल घोटालों को आधुनिक समय के सबसे ख़तरनाक अपराधों में से एक बताते हुए केंद्र और राज्य सरकारों, वित्तीय नियामकों और पुलिस तंत्र से तत्काल, समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता रेखांकित की।

अदालत ने विवेक यादव और करण यादव द्वारा दायर दूसरी ज़मानत याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दीं कि जांच पूरी होने और चार्जशीट दाख़िल होने के बाद परिस्थितियों में कोई ऐसा ठोस बदलाव नहीं आया है, जिसके आधार पर राहत दी जा सके। यह आदेश केवल ज़मानत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके साथ साइबर अपराधों की बढ़ती प्रवृत्ति और उससे आम नागरिकों को हो रहे नुक़सान पर व्यापक टिप्पणियां भी की गईं।

ज़मानत से इनकार, चिंता और गहरी

ज़मानत से इनकार करते हुए अदालत ने कहा कि साइबर फ्रॉड अब इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि यह एक संगठित और लगातार फैलता नेटवर्क बन चुका है, जो तकनीक, क़ानून प्रवर्तन और जन-जागरूकता की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाता है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित अक्सर कुछ ही मिनटों में अपनी जीवन-भर की जमा पूंजी गंवा बैठते हैं और एक बार पैसा कई डिजिटल परतों से गुज़र जाने के बाद उसकी वसूली बेहद कठिन हो जाती है।

हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल ज़मानत चरण तक सीमित हैं और इससे मुक़दमे के अंतिम फ़ैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन उसने यह भी साफ़ कर दिया कि साइबर फ्रॉड का पैमाना और उसकी जटिलता अब व्यक्तिगत मामलों से कहीं आगे की चुनौती बन चुकी है।

राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित जवाब की ज़रूरत

अदालत ने अपने अवलोकनों में केंद्र व राज्य सरकारों, वित्तीय नियामकों और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से साइबर अपराध की रोकथाम, पहचान और जन-जागरूकता के लिए ठोस व्यवस्था मज़बूत करने को कहा। विशेष रूप से अदालत ने निम्न बिंदुओं पर ज़ोर दिया—

  • उभरते डिजिटल फ्रॉड से निपटने के लिए क़ानूनी सुधार
  • बैंकिंग और डिजिटल भुगतान प्रणालियों में मज़बूत तकनीकी सुरक्षा उपाय
  • पुलिस, बैंक और नियामकों के बीच बेहतर तालमेल
  • आम लोगों को ठगी के तरीकों से सचेत करने के लिए निरंतर जागरूकता अभियान

अदालत ने व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग, लीक और अवैध बिक्री पर भी चिंता जताई और इसे साइबर फ्रॉड नेटवर्क को ताक़त देने वाला एक बड़ा कारण बताया।

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शिकायत प्रक्रिया सरल हो, तभी पैसा बचेगा

अदालत की सबसे अहम टिप्पणियों में से एक साइबर फ्रॉड की शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर थी। अदालत ने कहा कि शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया सरल, तेज़ और सुलभ होनी चाहिए, ताकि पीड़ित तुरंत रिपोर्ट कर सकें और शुरुआती घंटों में ही लेन-देन को फ्रीज़ किया जा सके।

अदालत ने ज़ोर देकर कहा कि पुलिस, बैंक, नियामक संस्थाएं और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म — सभी को एक साथ और तुरंत कार्रवाई करनी होगी, क्योंकि शुरुआती समय ही वह चरण होता है जब पैसे की रिकवरी की संभावना सबसे ज़्यादा रहती है।

‘खामोश लेकिन ख़तरनाक’ अपराध

अदालत ने डिजिटल ठगी को एक “खामोश लेकिन बेहद ख़तरनाक” अपराध बताया, यह कहते हुए कि अपराधी लगातार नई तकनीकों और मानवीय कमज़ोरियों के अनुसार अपने तरीक़े बदलते रहते हैं। फ़र्ज़ी कस्टमर-केयर कॉल, फ़िशिंग लिंक, पहचान की नकल और अकाउंट हैकिंग जैसे तरीक़े आम नागरिकों को निशाना बना रहे हैं, जिनके पास तकनीकी जानकारी सीमित होती है।

अदालत ने माना कि डिजिटल लेन-देन की रफ़्तार और गुमनामी ने अपराधियों को बढ़त दे दी है, जिससे पारंपरिक जांच के तरीक़े तब तक कारगर नहीं रह जाते, जब तक उन्हें उन्नत तकनीक और रियल-टाइम समन्वय का सहारा न मिले।

कई मामलों से जुड़े आरोपी

मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, विवेक यादव और करण यादव पर कई साइबर फ्रॉड मामलों से जुड़े होने का आरोप है। अदालत ने माना कि ऐसे में ज़मानत देना न केवल जांच को प्रभावित कर सकता है, बल्कि बड़े नेटवर्क को तोड़ने के प्रयासों को भी कमजोर कर सकता है।

व्यापक असर

क़ानूनी जानकारों का कहना है कि यह आदेश भारत में बढ़ते साइबर अपराध को लेकर न्यायपालिका की बढ़ती चिंता को दर्शाता है। जैसे-जैसे डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनते जा रहे हैं, अदालतें साइबर फ्रॉड को केवल आपराधिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था के लिए प्रणालीगत ख़तरा मानने लगी हैं।

अदालत का संदेश साफ़ है — जब तक क़ानून मज़बूत नहीं होंगे, तकनीक स्मार्ट नहीं होगी और प्रतिक्रिया तेज़ नहीं होगी, तब तक डिजिटल ठगी भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में जनता के भरोसे के लिए गंभीर चुनौती बनी रहेगी।

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