नई दिल्ली | संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने स्मार्टफोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बढ़ती लत को एक “गंभीर और तेजी से फैलती सामाजिक समस्या” करार दिया है। सर्वे के अनुसार, यह प्रवृत्ति अब केवल बच्चों और युवाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि वयस्क आबादी के मानसिक स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और सामाजिक व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।
सर्वे में कहा गया है कि अत्यधिक स्क्रीन-टाइम, सोशल मीडिया पर लगातार मौजूदगी और ऑटो-प्ले आधारित कंटेंट ने डिजिटल एडिक्शन को नई गति दी है। इसका सीधा असर पढ़ाई में गिरावट, कार्यस्थलों पर उत्पादकता में कमी, नींद से जुड़ी समस्याओं और बढ़ते मानसिक तनाव के रूप में दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि समय रहते इस प्रवृत्ति को नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसके दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक परिणाम हो सकते हैं।
बच्चे और युवा सबसे अधिक जोखिम में
इकोनॉमिक सर्वे ने बच्चों और युवाओं को डिजिटल लत के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील वर्ग बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, कम उम्र में बिना पर्याप्त निगरानी के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच बच्चों को अनुपयुक्त कंटेंट, ऑनलाइन बदमाशी, जुए और अत्यधिक तुलना-आधारित सोशल मीडिया व्यवहार की ओर धकेल रही है। इससे चिंता, अवसाद, आत्म-विश्वास में कमी और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत
सर्वे में कहा गया है कि इस चुनौती से निपटने के लिए भारत को बहुस्तरीय रणनीति अपनानी होगी, जिसमें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका सबसे अहम होगी। रिपोर्ट ने सिफारिश की है कि सोशल मीडिया, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट प्लेटफॉर्म्स पर प्रभावी उम्र-सत्यापन प्रणाली अनिवार्य की जाए। इसके साथ ही बच्चों के लिए डिफॉल्ट सेफ्टी सेटिंग्स, कंटेंट फिल्टर और स्क्रीन-टाइम लिमिट लागू करने की जरूरत बताई गई है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला
इकोनॉमिक सर्वे ने ऑस्ट्रेलिया, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के उदाहरण देते हुए कहा है कि वहां डिजिटल लत को सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा गया है। इन देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर समय सीमा, ऑनलाइन गेमिंग पर कड़े नियम और माता-पिता को तकनीकी नियंत्रण के अधिकार दिए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भी इसी तरह के नीतिगत कदमों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
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परिवार और स्कूलों की भूमिका
रिपोर्ट में परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर भी जोर दिया गया है। माता-पिता को सलाह दी गई है कि वे बच्चों के स्क्रीन-टाइम पर नजर रखें, फोन-मुक्त समय तय करें और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें। स्कूलों में अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यशालाएं आयोजित करने की सिफारिश की गई है, जिनमें डिजिटल लत के शुरुआती संकेत, सीमाएं तय करने के तरीके और पैरेंटल कंट्रोल टूल्स के उपयोग की जानकारी दी जाए।
सीमित डिवाइस और सुरक्षित विकल्प
इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि बच्चों के लिए अत्यधिक फीचर-सम्पन्न स्मार्टफोन की बजाय सीमित सुविधाओं वाले डिवाइस या पढ़ाई-केंद्रित टैबलेट को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ऐसे उपकरणों में समय सीमा, कंटेंट फिल्टर और ऐप प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए, ताकि हिंसा, अश्लीलता और जुए जैसे जोखिमों से बचाव किया जा सके।
ऑनलाइन जुआ और शॉर्ट-वीडियो पर चिंता
रिपोर्ट में ऑनलाइन जुआ और रियल-मनी गेमिंग को गंभीर चिंता का विषय बताया गया है। सर्वे के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स से आर्थिक नुकसान, मानसिक तनाव और कई मामलों में आत्मघाती विचारों तक की स्थिति बन रही है। इसी तरह शॉर्ट-वीडियो और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स की लत से नींद की कमी, ध्यान भटकना और तनाव बढ़ने की बात भी सामने आई है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गेमिंग डिसऑर्डर को मान्यता दिए जाने का उल्लेख करते हुए सर्वे ने कहा है कि डिजिटल लत अब केवल व्यवहारिक समस्या नहीं रही, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा सार्वजनिक मुद्दा बन चुकी है। इस संदर्भ में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित प्रयास, स्कूल-परिवार-प्लेटफॉर्म की साझेदारी और दीर्घकालिक नीति हस्तक्षेप की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
इकोनॉमिक सर्वे का निष्कर्ष है कि डिजिटल तकनीक विकास और सुविधा का साधन है, लेकिन इसके अनियंत्रित उपयोग से उत्पन्न हो रही मानसिक और सामाजिक चुनौतियों को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों और युवाओं की मानसिक सेहत की रक्षा के लिए समयबद्ध और ठोस कदम उठाना आवश्यक हो गया है।
