ट्रेन लेट हुई, परीक्षा छूटी: सात साल बाद रेलवे को मुआवजा आदेश

Team The420
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लखनऊ | ट्रेन की देरी के कारण एक किशोरी छात्रा को महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा से वंचित होना पड़ा, और अब उस घटना के सात साल बाद न्यायिक हस्तक्षेप के जरिए मामला अपने निष्कर्ष पर पहुंचा है। बस्ती जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने रेलवे को सेवा में कमी का दोषी ठहराते हुए ₹9.1 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह फैसला 2018 से चली आ रही कानूनी लड़ाई का अंत करता है।

यह मामला उस छात्रा से जुड़ा है, जो उस समय 17 वर्ष की थी और लखनऊ विश्वविद्यालय के बीएससी बायोटेक्नोलॉजी पाठ्यक्रम की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने वाली थी। परीक्षा 7 मई को आयोजित की गई थी और अभ्यर्थियों के लिए दोपहर 12.30 बजे तक परीक्षा केंद्र में रिपोर्ट करना अनिवार्य था। छात्रा का परीक्षा केंद्र लखनऊ स्थित जय नारायण पीजी कॉलेज निर्धारित किया गया था।

यात्रा योजना और ट्रेन की देरी

शिकायत के अनुसार, छात्रा ने परीक्षा के दिन सुबह बस्ती से गोरखपुर–लखनऊ इंटरसिटी सुपरफास्ट एक्सप्रेस से यात्रा की थी। ट्रेन का निर्धारित समय सुबह 6.55 बजे बस्ती से प्रस्थान और 11 बजे लखनऊ पहुंचने का था। इसी समय-सारणी के आधार पर यात्रा की योजना बनाई गई थी, ताकि परीक्षा केंद्र पर समय से पहले पहुंचा जा सके।

हालांकि, ट्रेन निर्धारित समय से लगभग ढाई घंटे की देरी से लखनऊ पहुंची। जब तक छात्रा परीक्षा केंद्र पहुंची, तब तक प्रवेश द्वार बंद हो चुके थे और उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई। परिणामस्वरूप वह उस वर्ष प्रवेश परीक्षा में शामिल नहीं हो सकी और उसका एक पूरा शैक्षणिक अवसर समाप्त हो गया।

उपभोक्ता आयोग की टिप्पणियां

उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में कहा कि छात्रा द्वारा बनाई गई यात्रा योजना पूरी तरह तर्कसंगत और उचित थी। एक सुपरफास्ट ट्रेन की प्रकाशित समय-सारणी पर भरोसा करना स्वाभाविक है, विशेषकर तब जब यात्रा किसी समय-संवेदनशील उद्देश्य—जैसे प्रवेश परीक्षा—के लिए की जा रही हो। आयोग ने माना कि यह देरी न तो मामूली थी और न ही ऐसी जिसे नजरअंदाज किया जा सके।

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घटना के बाद छात्रा और उसके परिवार ने उपभोक्ता फोरम का रुख किया। उनकी दलील थी कि रेलवे द्वारा ट्रेन को समय पर न चलाना लापरवाही है और इससे छात्रा को गंभीर शैक्षणिक नुकसान हुआ। शिकायत में कहा गया कि परीक्षा छूटने से आगे की पढ़ाई की योजना प्रभावित हुई और वैकल्पिक शैक्षणिक रास्ते अपनाने पड़े।

‘सेवा में कमी’ का मामला

सुनवाई के दौरान आयोग ने यह स्पष्ट किया कि यह प्रकरण उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत ‘सेवा में कमी’ की श्रेणी में आता है। आदेश में कहा गया कि परिचालन कारणों से कभी-कभी ट्रेनें देर से चल सकती हैं, लेकिन यात्रियों को घोषित समय-सारणी पर भरोसा करने का अधिकार है—खासकर तब, जब देरी के परिणाम गंभीर और पूर्वानुमेय हों।

आयोग ने यह भी दर्ज किया कि छात्रा के पास देरी को रोकने या उसका प्रभाव कम करने का कोई साधन नहीं था और उसने एक प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थी के रूप में सभी आवश्यक सावधानियां बरती थीं। आयोग के अनुसार, यह नुकसान केवल असुविधा तक सीमित नहीं था, बल्कि एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक अवसर का नुकसान था, जिसके दीर्घकालिक प्रभाव हो सकते हैं।

मुआवजा और व्यापक महत्व

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने ₹9.1 लाख का मुआवजा तय किया। इस राशि में मानसिक पीड़ा, शैक्षणिक अवसर के नुकसान और मुकदमेबाजी का खर्च शामिल है। रेलवे को निर्देश दिया गया है कि वह निर्धारित समय-सीमा के भीतर यह राशि अदा करे।

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह फैसला संस्थागत जवाबदेही की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। हाल के वर्षों में उपभोक्ता आयोग ऐसे मामलों में केवल प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि शिक्षा और करियर पर पड़ने वाले प्रभाव को भी मुआवजे के निर्धारण में शामिल कर रहे हैं।

यह मामला उन छात्रों की स्थिति को भी उजागर करता है, जो परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर होते हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां विकल्प सीमित हैं। हालांकि आयोग ने कोई व्यापक दिशा-निर्देश जारी नहीं किए, लेकिन फैसले में समय-संवेदनशील सेवाओं की विश्वसनीयता की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

शिकायतकर्ता के लिए यह आदेश वर्षों से चली आ रही पीड़ा का औपचारिक अंत है। भले ही मुआवजा खोए हुए अवसर की पूरी भरपाई न कर सके, लेकिन यह फैसला स्पष्ट करता है कि जब सेवा में चूक से किसी व्यक्ति को ठोस नुकसान होता है, तो सेवा प्रदाता को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।

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