गाजियाबाद | ऑनलाइन कारोबार और डिजिटल आवेदन प्रक्रियाओं के बढ़ते चलन के बीच साइबर ठगी के मामले लगातार नए रूपों में सामने आ रहे हैं। ताजा मामला गाजियाबाद के अंकुर विहार इलाके का है, जहां एक युवक को नामी कंपनी की डिस्ट्रीब्यूटरशिप दिलाने का भरोसा देकर साइबर ठगों ने उससे ₹23.53 लाख की ठगी कर ली। यह घटना दिखाती है कि किस तरह संगठित साइबर अपराधी ऑनलाइन बिजनेस के इच्छुक लोगों को निशाना बना रहे हैं।
पीड़ित जितेंद्र तिवारी ने एक प्रतिष्ठित कंपनी की डिस्ट्रीब्यूटरशिप के लिए ऑनलाइन एक वेबसाइट के माध्यम से आवेदन किया था। आवेदन के कुछ समय बाद ही उनसे संपर्क किया गया। कॉल करने वालों ने खुद को कंपनी का प्रतिनिधि बताया और कंपनी के आधिकारिक पते से मिलती-जुलती एक फर्जी ईमेल आईडी का इस्तेमाल किया। ईमेल की भाषा, दस्तावेज़ों का प्रारूप और बातचीत का तरीका इतना पेशेवर था कि पीड़ित को किसी भी तरह की शंका नहीं हुई।
जांच में सामने आया है कि ठगों ने डिस्ट्रीब्यूटरशिप प्रक्रिया, संभावित मांग, सप्लाई सिस्टम और मुनाफे से जुड़ी विस्तृत जानकारी साझा की। बातचीत में कॉन्ट्रैक्ट, लॉजिस्टिक्स और टारगेट मार्केट जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जिससे यह पूरी प्रक्रिया एक वैध कारोबारी सौदे जैसी प्रतीत होती रही। इसी भरोसे के चलते पीड़ित धीरे-धीरे ठगों के जाल में फंसता चला गया।
ठगी की शुरुआत प्रोसेसिंग फीस के नाम पर की गई। इसके बाद अलग-अलग चरणों में हैंडलिंग चार्ज, रजिस्ट्रेशन फीस और सिक्योरिटी मनी जैसी मदों के नाम पर रकम मांगी जाती रही। 18 नवंबर से 15 दिसंबर के बीच पीड़ित ने कई किस्तों में ठगों द्वारा बताए गए बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर किए।
हर भुगतान के साथ यह भरोसा दिलाया जाता रहा कि जल्द ही डिस्ट्रीब्यूटरशिप एग्रीमेंट भेज दिया जाएगा और औपचारिकताएं पूरी होते ही माल की सप्लाई शुरू कर दी जाएगी। जांच एजेंसियों के अनुसार, रकम को चरणबद्ध तरीके से मांगना और लगातार संपर्क बनाए रखना ठगों की सोची-समझी रणनीति थी, जिससे पीड़ित को किसी बड़े खतरे का आभास नहीं हुआ।
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इन आश्वासनों के आधार पर जितेंद्र तिवारी ने कुल ₹23,53,000 ठगों के खातों में जमा कर दिए। हालांकि तय समय बीत जाने के बावजूद न तो कोई एग्रीमेंट मिला और न ही किसी प्रकार की सप्लाई शुरू हुई। इसके बाद जब ठगों ने एक बार फिर अतिरिक्त भुगतान की मांग की, तब पीड़ित को पूरे मामले पर संदेह हुआ।
जब पीड़ित ने अपने पैसे वापस मांगे और स्पष्ट जवाब की मांग की, तो पहले टालमटोल की गई और बाद में कॉल उठाना बंद कर दिया गया। कुछ ही समय में उनका मोबाइल नंबर भी ब्लॉक कर दिया गया। इसी बिंदु पर यह स्पष्ट हो गया कि वह एक सुनियोजित साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।
घटना के बाद पीड़ित ने साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस के अनुसार, ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और फर्जी ईमेल आईडी की जांच की जा रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या इन्हीं खातों या संपर्कों का इस्तेमाल अन्य ठगी के मामलों में भी किया गया है।
साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि फर्जी डिस्ट्रीब्यूटरशिप और फ्रेंचाइज़ी के नाम पर होने वाली ठगी के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है। ठग अक्सर क्लोन वेबसाइट, मिलते-जुलते ईमेल डोमेन और औपचारिक भाषा का इस्तेमाल कर लोगों का भरोसा जीत लेते हैं। रकम को किस्तों में मंगवाना इस तरह की ठगी का आम पैटर्न है, जिससे शक की गुंजाइश कम हो जाती है।
पुलिस ने आम लोगों से अपील की है कि वे ऑनलाइन डिस्ट्रीब्यूटरशिप या फ्रेंचाइज़ी लेने से पहले कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट, रजिस्टर्ड कार्यालय और अधिकृत संपर्क सूत्रों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करें। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि किसी भी नामी कंपनी द्वारा व्यक्तिगत या असंबंधित खातों में बार-बार अग्रिम भुगतान की मांग एक बड़ा खतरे का संकेत है।
यह मामला एक बार फिर रेखांकित करता है कि डिजिटल सुविधाओं के साथ-साथ सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है। पुलिस ने नागरिकों से कहा है कि किसी भी साइबर ठगी की आशंका होने पर तुरंत साइबर क्राइम पोर्टल या नजदीकी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराएं, ताकि समय रहते धन के ट्रेल को रोका जा सके और आगे के नुकसान से बचाव किया जा सके।
