नई दिल्ली | IHHR Hospitality (Himachal) Pvt Ltd से जुड़े कथित बड़े कॉर्पोरेट घोटाले को लेकर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने जांच शुरू कर दी है। कंपनी पहले Sadar Himalayan Paradise Pvt Ltd के नाम से जानी जाती थी। जांच का केंद्र अवैध शेयर ट्रांसफर, फर्जी कॉर्पोरेट दस्तावेज़ और करोड़ों रुपये के संदिग्ध वित्तीय लेनदेन हैं।
यह मामला Zion Universal Pvt Ltd द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से सामने आया है। शिकायत के अनुसार, Zion Universal के पास फरवरी 2025 तक कंपनी की 99.98% हिस्सेदारी थी और कंपनी से जुड़े किसी भी बड़े फैसले के लिए उसकी स्पष्ट सहमति आवश्यक थी। इसके बावजूद, कुछ निदेशकों और उनसे जुड़े व्यक्तियों ने कथित तौर पर कंपनी पर नियंत्रण हासिल करने की साजिश रची।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि अगस्त 2024 से ही Zion Universal की हिस्सेदारी को कमजोर करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया था। इसके तहत कथित रूप से फर्जी दस्तावेज़ तैयार किए गए और बिना अनुमति कॉर्पोरेट फैसले लिए गए, जिससे बहुलांश शेयरधारक को दरकिनार किया जा सके।
EOW की एफआईआर में कई आरोपियों के नाम दर्ज हैं, जिनमें धैर्य चौधरी, सुमंत कपूर, राजेश रोहितभाई मेहता, प्रकाश लाल कपूर, संजीव त्रेहान, ममता पंवार, नवजोत मेहता, अशोक खन्ना, घनश्याम सेठ, मनप्रीत कौर टक्कर और दिलीप चिनुभाई चोकसी शामिल हैं। शिकायत में इन सभी पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप लगाए गए हैं।
शिकायत के मुताबिक, रिकॉर्ड में यह दर्शाया गया कि 3 दिसंबर 2024 और 13 फरवरी 2025 को कंपनी की असाधारण आम बैठक (EGM) और बोर्ड बैठकें आयोजित की गईं। हालांकि, Zion Universal का कहना है कि इन बैठकों में न तो वह स्वयं और न ही उसका कोई अधिकृत प्रतिनिधि मौजूद था, जिससे यह आशंका गहराती है कि ये बैठकें कागज़ों पर ही गढ़ी गईं।
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इन कथित बैठकों के जरिए बिना बहुलांश शेयरधारक की जानकारी के अहम प्रस्ताव पारित किए गए। सबसे बड़ा कदम कंपनी की अधिकृत शेयर पूंजी को ₹80 करोड़ से बढ़ाकर ₹170 करोड़ करना बताया गया है।
इसके बाद कथित तौर पर 8.7 करोड़ से अधिक शेयर IHRR Hospitality Pvt Ltd को आवंटित कर दिए गए। इस प्रक्रिया के बाद Zion Universal की हिस्सेदारी 99.98% से घटकर 47.67% रह गई, जबकि IHRR Hospitality की हिस्सेदारी 52.34% तक पहुंच गई। इससे कंपनी का नियंत्रण प्रभावी रूप से नए समूह के हाथों में चला गया।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि दिसंबर 2024 में एक “ब्याज-मुक्त ऋण” दिखाने वाला फर्जी समझौता तैयार किया गया। इस ऋण को बाद में बिना वैध अनुमति के इक्विटी में बदलने की योजना बनाई गई, जिसे शेयर डायल्यूशन की रणनीति का अहम हिस्सा बताया जा रहा है।
जांच एजेंसियां यह भी पड़ताल कर रही हैं कि इन लेनदेन में कई करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितताएं शामिल थीं और धन को परतदार कॉर्पोरेट संरचनाओं के जरिए घुमाया गया। इसी वजह से बैंक रिकॉर्ड, शेयर अलॉटमेंट दस्तावेज़, नियामक फाइलिंग और आंतरिक कॉर्पोरेट संवाद की गहन जांच की जा रही है।
एफआईआर में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़े प्रावधान लगाए गए हैं। जांच का मौजूदा फोकस दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता, धन के प्रवाह और कथित अवैध शेयर ट्रांसफर से लाभ पाने वालों की पहचान पर है।
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि मनी लॉन्ड्रिंग के ठोस सबूत सामने आते हैं तो मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) को भी सौंपा जा सकता है। लगभग पूर्ण शेयरधारिता के बावजूद नियंत्रण में अचानक आए बदलाव ने जांच एजेंसियों के लिए गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
यह मामला कॉर्पोरेट गवर्नेंस में खामियों को उजागर करता है, खासकर उन निजी कंपनियों में जहां फर्जी प्रस्तावों और दस्तावेज़ों के जरिए शेयरधारकों के अधिकारों को कमजोर किया जा सकता है।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, आरोपियों से पूछताछ, डिजिटल और वित्तीय साक्ष्यों की पड़ताल तथा नियामकीय फाइलिंग की जांच तेज़ होने की उम्मीद है। इस मामले का असर भारत में कॉर्पोरेट अनुपालन और शेयरधारक संरक्षण के ढांचे पर दूरगामी हो सकता है।
