नई दिल्ली | दुनिया के सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप की गोपनीयता नीतियां एक बार फिर कानूनी और सार्वजनिक जांच के दायरे में आ गई हैं। भारत समेत पांच देशों के याचिकाकर्ताओं ने व्हाट्सएप की पैरेंट कंपनी मेटा के खिलाफ अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा दायर किया है, जिसमें कंपनी के ‘एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन’ के दावों को सीधे चुनौती दी गई है।
मुकदमे में आरोप लगाया गया है कि व्हाट्सएप यूजर्स की निजी चैट्स को पूरी तरह सुरक्षित और अपठनीय बताकर अरबों लोगों को गुमराह किया गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि मैसेज डेटा को स्टोर किया जाता है, उसका विश्लेषण संभव है और कुछ परिस्थितियों में मेटा के कर्मचारियों को इन कथित निजी बातचीत तक पहुंच मिल सकती है।
भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका से जुड़े वादियों का कहना है कि मेटा ने व्हाट्सएप को पूरी तरह निजी और सुरक्षित प्लेटफॉर्म के रूप में पेश किया, जबकि इसकी वास्तविक तकनीकी कार्यप्रणाली उन सार्वजनिक दावों से मेल नहीं खाती। मुकदमे में कहा गया है कि संदेशों की पूर्ण गोपनीयता को लेकर किए गए दावे “झूठे और भ्रामक” हैं और कंपनी के पास इन बातचीत तक पहुंच बनाने की तकनीकी क्षमता मौजूद है।
इस कानूनी लड़ाई के केंद्र में व्हाट्सएप का मूल वादा है— कि किसी भी मैसेज को केवल भेजने वाला और प्राप्तकर्ता ही पढ़ सकता है, यहां तक कि कंपनी खुद भी नहीं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मैसेज मेटा के नियंत्रण वाले इंफ्रास्ट्रक्चर पर स्टोर होते हैं और कुछ हालात में आंतरिक स्तर पर उन तक पहुंच संभव है, जो ‘पूर्ण प्राइवेसी’ के दावे के विपरीत है।
मुकदमे में कुछ अज्ञात ‘व्हिसलब्लोअर्स’ का भी उल्लेख किया गया है, जिन्होंने कथित तौर पर प्राइवेसी उल्लंघन से जुड़ी अंदरूनी जानकारियां साझा की हैं। इन्हीं आधारों पर वादी इस मामले को ‘क्लास-एक्शन’ मुकदमे के रूप में मान्यता देने की मांग कर रहे हैं। यदि अदालत ऐसा करती है और आरोप सिद्ध होते हैं, तो दो अरब से अधिक यूजर्स वाले व्हाट्सएप के मामले में मेटा पर अरबों डॉलर का हर्जाना लगाया जा सकता है।
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डिजिटल अधिकारों के विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला प्राइवेसी कानूनों के लिहाज से एक अहम मोड़ बन सकता है, खासकर भारत जैसे देशों में, जहां व्हाट्सएप व्यक्तिगत संवाद, व्यापारिक लेन-देन और कई स्तरों पर सरकारी संचार का अहम माध्यम बन चुका है। करोड़ों यूजर्स के लिए यह ऐप संवेदनशील निजी, वित्तीय और पेशेवर जानकारियों का प्रमुख मंच है।
मेटा ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कंपनी ने मुकदमे को “तुच्छ और बेतुका” बताते हुए कहा है कि व्हाट्सएप पिछले एक दशक से ‘सिग्नल प्रोटोकॉल’ का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ सुरक्षित मैसेजिंग का गोल्ड स्टैंडर्ड मानते हैं। मेटा का दावा है कि न तो वह और न ही व्हाट्सएप यूजर्स के मैसेज पढ़ सकते हैं और यह मुकदमा केवल अटकलों पर आधारित है।
कंपनी ने यह भी संकेत दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं के वकीलों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग कर सकती है। मेटा के अनुसार, उसका एन्क्रिप्शन मॉडल स्वतंत्र शोधकर्ताओं द्वारा जांचा जा चुका है और दुनियाभर के नियामकों की कसौटी पर खरा उतरा है।
इस विवाद ने ‘एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन’ की व्यावहारिक सीमाओं को लेकर बहस को फिर से तेज कर दिया है। व्हाट्सएप का कहना है कि हर मैसेज एक यूनिक डिजिटल लॉक में बंद होता है, जिसे केवल भेजने और पाने वाले के फोन ही खोल सकते हैं। हालांकि आलोचक मेटाडाटा कलेक्शन, क्लाउड बैकअप और कंटेंट मॉडरेशन जैसी प्रक्रियाओं को संभावित कमजोर कड़ियां बताते हैं।
जैसे-जैसे अमेरिका में यह कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जा सकते हैं। नियामक संस्थाएं पहले से ही यूजर प्राइवेसी, राष्ट्रीय सुरक्षा और कॉरपोरेट जवाबदेही के बीच संतुलन तलाश रही हैं। मेटा के खिलाफ फैसला आने पर सख्त निगरानी की मांग तेज हो सकती है, जबकि मुकदमा खारिज होने की स्थिति में मौजूदा एन्क्रिप्शन प्रथाओं को कानूनी मजबूती मिल सकती है।
फिलहाल, यह मामला डिजिटल युग के सबसे बुनियादी वादों में से एक— निजी बातचीत की गोपनीयता— को न्यायिक जांच के केंद्र में ले आया है, जिस पर दुनिया भर के व्हाट्सएप यूजर्स की नजरें टिकी हुई हैं।
