नई दिल्ली | दक्षिण दिल्ली में रहने वाले बुज़ुर्ग एनआरआई दंपती से ₹14.85 करोड़ की ठगी के हाई-प्रोफाइल ‘डिजिटल अरेस्ट’ मामले में जांच एजेंसियों ने एक संगठित अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है। ताज़ा कार्रवाई में पांच और आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ इस केस में अब तक आठ लोगों को पकड़ा जा चुका है। जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क कंबोडिया और नेपाल से संचालित हो रहा था, जबकि भारत में मौजूद सहयोगी म्यूल खातों और रकम की लेयरिंग का काम संभाल रहे थे।
मामला तब उजागर हुआ जब ग्रेटर कैलाश क्षेत्र में रहने वाले 81 वर्षीय ओम तनेजा और 77 वर्षीय इंदिरा तनेजा को दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए डराया गया। ठगों ने खुद को दूरसंचार नियामक से जुड़ा अधिकारी बताते हुए दावा किया कि इंदिरा तनेजा के मोबाइल नंबर का इस्तेमाल मुंबई की एक मनी-लॉन्ड्रिंग जांच में हुआ है। ‘डिजिटल अरेस्ट’ का भय दिखाकर दंपती को बैंक खातों की कथित “जांच” के नाम पर रकम ट्रांसफर कराने को मजबूर किया गया।
जांच के अनुसार, ठगों ने फर्जी नोटिस, नकली जांच की स्क्रिप्ट और लगातार निगरानी का भ्रम रचकर पीड़ितों को गहरे मानसिक दबाव में रखा। इसी दौरान आठ अलग-अलग लेन-देन में कुल ₹14.85 करोड़ की राशि विभिन्न खातों में ट्रांसफर कराई गई, जिसे बाद में म्यूल खातों के जरिए अलग-अलग चैनलों से निकाला गया।
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ताज़ा गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अरुण कुमार तिवारी, प्रद्युम्न तिवारी, भूपेंद्र कुमार मिश्रा उर्फ अतुल मिश्रा, आदेश कुमार सिंह और महावीर शर्मा के रूप में हुई है। आरोपियों की पृष्ठभूमि बेहद सामान्य बताई जा रही है—कोई निजी डेटा-एंट्री से जुड़ा था, कोई पूजा-पाठ कराता था, कोई एमबीए कर चुका था, तो कोई ट्यूशन और कोचिंग के काम में लगा था। जांच एजेंसियों का कहना है कि यही विविध प्रोफाइल इस गिरोह की बड़ी ताकत बनी, जिससे लंबे समय तक संदेह नहीं हुआ।
इससे पहले की कड़ियों में दिव्यांग पटेल, क्रुतिक शितोले और अंकित मिश्रा उर्फ रॉबिन की गिरफ्तारी हो चुकी है। इन पर म्यूल खातों के संचालन, रकम की लेयरिंग और विदेश बैठे हैंडलर्स के निर्देश पर लेन-देन कराने के आरोप हैं। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ आरोपी स्वयंसेवी संस्थाओं या निजी फर्मों के नाम पर खातों का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि ठगी की रकम के स्रोत को छुपाया जा सके।
तकनीकी और वित्तीय विश्लेषण से पता चला है कि ठगी की राशि को कई चरणों में अलग-अलग खातों में घुमाया गया। मोबाइल फोन, चेकबुक और डिजिटल डिवाइस जब्त कर फॉरेंसिक जांच की जा रही है। एजेंसियों का मानना है कि यह सिंडिकेट केवल एक मामले तक सीमित नहीं है और इससे जुड़े अन्य पीड़ितों की भी पहचान की जा रही है।
जांच एजेंसियों ने दोहराया है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे मामलों में ठग कानून-व्यवस्था, जांच एजेंसियों और बैंकों का नाम लेकर भय पैदा करते हैं और वीडियो कॉल, फर्जी दस्तावेज़ तथा लगातार दबाव बनाकर पीड़ितों से पैसे ट्रांसफर कराते हैं। किसी भी सरकारी संस्था द्वारा फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसे नहीं मांगे जाते।
मामले को संगठित, अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध मानते हुए आगे की जांच तेज कर दी गई है। विदेश में बैठे हैंडलर्स, शेष म्यूल खातों और पूरी मनी-ट्रेल को ट्रेस करने की कोशिश जारी है। जांच एजेंसियों ने संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
