नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वह बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और वयस्कों की सहमति के बिना ऑनलाइन प्रसारित होने वाले यौन सामग्री वाले वीडियो पर रोक लगाने के लिए एक व्यापक नीतिगत ढांचा तैयार करने पर विचार कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत सोशल मीडिया कंपनियों और इंटरनेट प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सख्त की जा सकती है। इसमें गैरकानूनी और आपत्तिजनक सामग्री को तत्काल हटाने के साथ ही ऐसी सामग्री की जानकारी संबंधित कानूनी अधिकारियों को देने की जिम्मेदारी भी शामिल हो सकती है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ को सरकार के रुख से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित नीतिगत ढांचे का उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार को रोकना और ऐसी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। इसके तहत इंटरनेट मध्यस्थों यानी सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को सामग्री हटाने तथा संबंधित अधिकारियों को सूचना देने के मामले में अधिक जवाबदेह बनाया जा सकता है।
तीसरे पक्ष की शिकायतों पर भी हो सकता है विचार
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि प्रस्तावित व्यवस्था में केवल पीड़ित व्यक्ति की शिकायत पर ही निर्भर रहने के बजाय तीसरे पक्ष की ओर से दर्ज कराई गई वास्तविक शिकायतों पर भी विचार करने का प्रावधान हो सकता है। इससे उन मामलों में कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है, जिनमें पीड़ित सामाजिक दबाव, बदनामी के डर या अन्य कारणों से स्वयं शिकायत दर्ज कराने में असमर्थ होते हैं।
ऑनलाइन यौन शोषण से जुड़ी सामग्री कई बार अलग-अलग मंचों पर बार-बार साझा की जाती है। ऐसे मामलों में पीड़ित के लिए हर जगह से सामग्री हटवाना मुश्किल हो सकता है। तीसरे पक्ष की वास्तविक शिकायतों पर विचार करने की व्यवस्था इस तरह के मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग में मददगार हो सकती है।
केंद्र सरकार इस समस्या से निपटने के लिए वैधानिक विधायी तंत्र लाने पर भी विचार कर रही है। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने स्पष्ट किया कि प्रस्ताव का मसौदा संसद के समक्ष पेश किए जाने से पहले इसके विस्तृत प्रावधानों के बारे में जानकारी साझा नहीं की जा सकती।
वयस्कों की सुरक्षा को लेकर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान गैर-सरकारी संगठन प्रज्वला की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट ने वयस्कों की सुरक्षा से जुड़े कानूनी उपायों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने अदालत को बताया कि वयस्कों की सहमति के बिना उनके यौन सामग्री वाले वीडियो इंटरनेट पर प्रसारित किए जा रहे हैं और इस समस्या से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी सुरक्षा पर्याप्त नहीं है।
यह मुद्दा उन मामलों से भी जुड़ा है, जिनमें किसी व्यक्ति की निजी तस्वीरें या वीडियो उसकी अनुमति के बिना इंटरनेट पर अपलोड कर दिए जाते हैं। एक बार ऐसी सामग्री ऑनलाइन आने के बाद उसे डाउनलोड करके दूसरे मंचों पर साझा किया जा सकता है। इससे मूल सामग्री हटाए जाने के बाद भी उसकी प्रतियां इंटरनेट पर बनी रह सकती हैं।
ऐसे मामलों में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका, शिकायत मिलने पर कार्रवाई की समयसीमा और जांच एजेंसियों के साथ सहयोग जैसे सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं। प्रस्तावित नीतिगत ढांचा बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के अलावा वयस्कों की सहमति के बिना निजी यौन सामग्री प्रसारित किए जाने के मामलों पर भी असर डाल सकता है।
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ओटीटी और सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री रोकने की मांग
सुप्रीम कोर्ट ने ओवर-द-टॉप (ओटीटी) सेवाओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यौन रूप से अश्लील सामग्री के प्रसारण पर पूर्ण रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। पांच याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर इस याचिका में ऑनलाइन अश्लील सामग्री के प्रसार को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए एक स्वतंत्र प्राधिकरण गठित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था आवश्यक है। स्वतंत्र प्राधिकरण के गठन की मांग के जरिए ऑनलाइन सामग्री के नियमन और संबंधित मंचों की जवाबदेही का मुद्दा अदालत के सामने रखा गया है।
सुनवाई स्थगित होने के बीच केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित नीतिगत ढांचे की जानकारी सामने आने से इस विषय पर कानूनी और नियामकीय उपायों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, सरकार ने अभी तक प्रस्ताव के सभी प्रावधान सार्वजनिक नहीं किए हैं।
प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और शिकायत निवारण पर रहेगा जोर
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत यह स्पष्ट किया जा सकता है कि गैरकानूनी यौन सामग्री की जानकारी मिलने पर डिजिटल प्लेटफॉर्म को क्या कदम उठाने होंगे, शिकायतों का सत्यापन कैसे किया जाएगा और संबंधित कानूनी अधिकारियों को सूचना देने की प्रक्रिया क्या होगी। तीसरे पक्ष की शिकायतों पर विचार किए जाने की संभावना भी इस व्यवस्था का अहम हिस्सा हो सकती है।
फिलहाल, केंद्र सरकार नीतिगत और विधायी विकल्पों पर विचार कर रही है। प्रस्ताव के अंतिम स्वरूप और उसके कानूनी प्रभाव का पता मसौदा सामने आने तथा आगे की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही चलेगा। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जबकि ऑनलाइन यौन शोषण से जुड़ी सामग्री पर रोक लगाने और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करने का मुद्दा विचाराधीन है।
